Lord Krishna and Arjuna Swami Mukundananda

Bhagavad Gita

The Song of God

Commentary by स्वामी मुकुंदानंद

प्रामाणिक भाष्य और गहन स्पष्टता के साथ शाश्वत ज्ञान की खोज करें। भगवान कृष्ण और अर्जुन के अमर संवाद को पढ़ें।

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न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् |
कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै: || 5||

Chapter 3, Verse 5

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Translation: कोई भी मनुष्य एक क्षण के लिए अकर्मा नहीं रह सकता। वास्तव में सभी प्राणी प्रकृति द्वारा उत्पन्न तीन गुणों के अनुसार कर्म करने के लिए विवश होते हैं।

Commentary: कुछ लोग सोंचते हैं कि कर्म का संबंध केवल व्यवसायिक कार्यों का निष्पादन करने से है न कि दिनचर्या संबंधी कार्य जैसे कि-खाना, पीना, निद्रा, जागना, और विचार करना। इसलिए प्रायः ऐसे लोग जब अपना …

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भगवद्गीता की शिक्षाएँ

ब्रह्म विद्या प्रदान करती है

तत्काल समस्या से निपटने में असमर्थ होकर अर्जुन ने अपने अनुभव किए जा रहे विषाद को दूर करने के उपाय के लिए श्रीकृष्ण की शरण ली। श्रीकृष्ण ने उन्हें केवल तत्काल समस्या पर सलाह नहीं दी, बल्कि जीवन-दर्शन पर एक गहन उपदेश दिया। इसलिए भगवद्गीता का सर्वोपरि उद्देश्य ब्रह्म विद्या, अर्थात ईश्वर-साक्षात्कार के विज्ञान को प्रदान करना है।

योग के अभ्यास की शिक्षा देती है

भगवद्गीता केवल उच्च दार्शनिक समझ प्रदान करके संतुष्ट नहीं होती; यह दैनिक जीवन में अपने आध्यात्मिक सिद्धांतों को लागू करने की स्पष्ट तकनीकें भी बताती है। हमारे जीवन में अध्यात्म के विज्ञान को लागू करने की इन तकनीकों को "योग" कहा जाता है। इसलिए भगवद्गीता को "योग शास्त्र" भी कहा जाता है, अर्थात योग के अभ्यास की शिक्षा देने वाला शास्त्र।

जीवन के सभी पहलुओं को समाहित करती है

अनुभवहीन आध्यात्मिक साधक प्रायः अध्यात्म को सांसारिक जीवन से अलग कर देते हैं; कुछ लोग आनंद की अवस्था को परलोक में प्राप्त होने वाली वस्तु मानते हैं। परंतु भगवद्गीता ऐसा कोई भेद नहीं करती और इसी संसार में मानव जीवन के हर पहलू को पवित्र करने का लक्ष्य रखती है। इसी कारण इसके सभी अठारह अध्यायों को योग के भिन्न-भिन्न प्रकार कहा गया है, क्योंकि वे आध्यात्मिक ज्ञान को व्यावहारिक जीवन में लागू करने की विधियों से संबंधित हैं।

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विषय सूची

Journey through 18 chapters of timeless wisdom, each revealing profound truths about life, duty, and the divine

1

अर्जुन विषाद योग

युद्ध के परिणाम पर शोक प्रकट करना

भगवद्गीता का उपदेश एक ही वंश के दो चचेरे भाइयों कौरव और पाण्डवों के मध्य हुए महाभारत युद्ध की रणभूमि …

2

सांख्य योग

विश्लेषणात्मक ज्ञान का योग

इस अध्याय में अर्जुन अपने सम्मुख उत्पन्न स्थिति का सामना करने में अपनी असमर्थता को पुनः प्रकट करता है और …

3

कर्मयोग

कर्म का विज्ञान

इस अध्याय में श्रीकृष्ण यह समझाते हैं कि सभी जीव अपनी स्वाभाविक प्रकृति के गुणों के कारण कार्य करने के …

4

ज्ञान कर्म संन्यास योग

ज्ञान का योग और कर्म करने का विज्ञान

चौथे अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को दिए जा रहे दिव्य ज्ञान के उद्गम को प्रकट करते हुए उसके विश्वास को …

5

कर्म संन्यास योग

वैराग्य का योग

इस अध्याय में कर्म संन्यास के मार्ग की तुलना कर्मयोग के मार्ग के साथ की गयी है। श्रीकृष्ण बताते हैं …

6

ध्यानयोग

ध्यान का योग

श्रीकृष्ण कर्मयोग और कर्म संन्यास के तुलनात्मक विवेचन को छठे अध्याय में भी जारी रखते हैं और कर्मयोग की संस्तुति …

7

ज्ञान विज्ञान योग

दिव्य ज्ञान की अनुभूति द्वारा प्राप्त योग

यह अध्याय भगवान की शक्तियों के भौतिक और आध्यात्मिक आयामों के वर्णन के साथ आरम्भ होता है। श्रीकृष्ण व्यक्त करते …

8

अक्षर ब्रह्म योग

अविनाशी भगवान का योग

यह अध्याय संक्षेप में कुछ महत्वपूर्ण अवधारणाओं का वर्णन करता है जिनका उपनिषदों में विस्तार से उल्लेख किया गया है। …

9

राज विद्या योग

राज विद्या द्वारा योग

 

सातवें और आठवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने भक्ति को भगवत्प्राप्ति का सरल साधन और योग की सर्वोच्च स्थिति बताया …

10

विभूति योग

भगवान के अनन्त वैभवों की स्तुति द्वारा प्राप्त योग

इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने अपनी महिमा का वर्णन किया है जिससे अर्जुन को भगवान में ध्यान केन्द्रित करने में …

11

विश्वरूप दर्शन योग

भगवान के विराट रूप के दर्शन का योग

पिछले अध्याय में श्रीकृष्ण ने अर्जुन की भक्ति को पोषित करने के लिए अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन किया था। …

12

भक्तियोग

भक्ति का विज्ञान

इस अध्याय में के अन्य मार्गों की अपेक्षा भक्ति मार्ग की सर्वोत्कृष्टता पर प्रकाश डाला गया है। इसका प्रारम्भ अर्जुन …

13

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

योग द्वारा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विभेद को जानना

भगवद्गीता में कुल अठारह अध्याय हैं। इनका तीन खण्डों में विभाजन किया जा सकता है। प्रथम खण्ड के छः अध्यायों …

14

गुण त्रय विभाग योग

त्रिगुणों के ज्ञान का योग

पिछले अध्याय में आत्मा और शरीर के बीच के अन्तर को विस्तार से समझाया गया था। इस अध्याय में माया …

15

पुरुषोत्तम योग

सर्वोच्च दिव्य स्वरूप योग

पिछले अध्याय में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया था कि माया के तीन गुणों से रहित होकर ही जीव अपने दिव्य …

16

दैवासुर सम्पद् विभाग योग

दैवीय और आसुरी प्रकृति में भेद का योग

इस अध्याय में श्रीकृष्ण दैवीय और आसुरी दो प्रकार की प्रकृति का वर्णन करते हैं। दैवीय गुण धार्मिक ग्रंथों के …

17

श्रद्धा त्रय विभाग योग

श्रद्धा के तीन विभागों के ज्ञान का योग

चौदहवें अध्याय में श्रीकष्ण ने माया के तीन गुणों की व्याख्या की थी और यह भी समझाया था कि किस …

18

मोक्ष संन्यास योग

संन्यास में पूर्णता और शरणागति का योग

भगवद्गीता का अंतिम अध्याय सबसे बड़ा है और इसमें कई विषयों को सम्मिलित किया गया है। अर्जुन संन्यास और त्याग …

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